खगोलीय दूरदर्शी की परिभाषा

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खगोलीय दूरदर्शी की परिभाषा

प्रश्न – एक अपवर्तनी खगोलीय दूरदर्शी का किरण आरेख खींचिए जब अन्तिम प्रतिबिम्ब स्पष्ट दृष्टि की न्यूनतम दूरी पर बनता है। इसकी आवर्धन क्षमता के लिए व्यंजक भी स्थापित कीजिए। (NCERT)(2016, 17, 18, 19)
या
खगोलीय दूरदर्शी का किरण आरेख बनाइए। जब अन्तिम प्रतिबिम्ब अनन्तता पर बन रहा है। दूरदर्शी में अभिदृश्यक लेन्स का द्वारक बड़े आकार का क्यों लिया जाता है? (2015, 18)
या
खगोलीय दूरदर्शी द्वारा अन्तिम प्रतिबिम्ब स्पष्ट दृष्टि की न्यूनतम दूरी पर बनने का किरण आरेख बनाइए। (2017)
या
अपवर्तनी खगोलीय दूरदर्शी का किरण आरेख बनाइए जबकि अन्तिम प्रतिबिम्ब स्पष्ट दृष्टि की न्यूनतम दूरी पर बनता है। इस स्थिति में आवर्धन क्षमता का सूत्र लिखिए। (2020)

एक अपवर्तनी खगोलीय दूरदर्शी का किरण आरेख खींचिए जब अन्तिम प्रतिबिम्ब स्पष्ट दृष्टि की न्यूनतम दूरी पर बनता है। इसकी आवर्धन क्षमता के लिए व्यंजक भी स्थापित कीजिए

उत्तरखगोलीय दूरदर्शी (Astronomical Telescope)

-खगोलीय दूरदर्शी एक ऐसा प्रकाशिक यन्त्र है जिसके द्वारा बना दूर स्थित वस्तु का प्रतिबिम्ब का आँख पर बड़ा दर्शन कोण बनाता है जिससे कि वह वस्तु आँख को बड़ी दिखायी पड़ती है।

रचना

– इसमें धातु की एक लम्बी बेलनाकार नली होती है जिसके एक सिरे पर बड़ी फोकस-दूरी तथा बड़े द्वारक का अवर्णक उत्तल लेन्स लगा होता है, जिसे ‘अभिदृश्यक लेन्स’ कहते हैं। नली के दूसरे सिरे पर एक अन्य छोटी नली फिट होती है जो दन्तुर दण्ड-चक्र (रैक-पिनयन) व्यवस्था द्वारा बड़ी नली में आगे-पीछे खिसकाई जा सकती है। छोटी नली के बाहरी सिरे पर एक छोटी फोकस-दूरी तथा छोटे द्वारक का अवर्णक उत्तल लेन्स लगा रहता है जिसे अभिनेत्र लेन्स अथवा नेत्रिका कहते हैं। नेत्रिका के फोकस पर क्रॉस-तार लगे रहते हैं।

समायोजन

सबसे पहले नेत्रिका को छोटी नली में आगे-पीछे खिसकाकर क्रॉस-तार पर फोकस कर लेते हैं। फिर जिस वस्तु को देखना हो उसकी ओर अभिदृश्यक लेन्स को दिष्ट कर देते हैं। दन्तुर-दण्ड-चक्र व्यवस्था द्वारा छोटी नली को लम्बी नली में आगे-पीछे खिसकाकर अभिदृश्यक लेन्स की क्रॉस-तार से दूरी इस प्रकार समायोजित करते हैं कि वस्तु के प्रतिबिम्ब और क्रॉस-तार में लम्बन न रहे। इस स्थिति में वस्तु का स्पष्ट प्रतिबिम्ब दिखाई देगा। यह प्रतिबिम्ब लेन्सों द्वारा प्रकाश के अपवर्तन से बनता है। अतः यह दूरदर्शी ‘अपवर्तक’ दूरदर्शी है।

प्रतिबिम्ब का बनना

-चित्र (a) में दूरदर्शी का अभिदृश्यक लेन्स 0 तथा नेत्रिका E दिखाये गये हैं। AB एक दूर-स्थित वस्तु है जिसका A सिरा दूरदर्शी की अक्ष पर है। लेन्स 0 के द्वारा AB का वास्तविक, उल्टा व छोटा प्रतिबिम्ब A’B’, लेन्स के द्वितीय फोकस F₀ पर बनता है। यह प्रतिबिम्ब नेत्रिका E के प्रथम फोकस Fₑ के भीतर है तथा नेत्रिका के लिए वस्तु का कार्य करता है। अत: नेत्रिका, A’B’ का आभासी, सीधा तथा बड़ा प्रतिबिम्ब A”B” बनाती है। B” की स्थिति ज्ञात करने के लिए,B’ से दो विछिन्न किरणें (……..) ली गई हैं। एक किरण जो E के प्रकाशिक-केन्द्र में से जाती है, सीधी चली जाती है तथा दूसरी किरण जो मुख्य अक्ष से समान्तर ली गई है, E के दूसरे फोकस Fₒ से होकर जाती है। ये किरणें पीछे बढ़ाने पर बिन्दु B” पर मिलती हैं।

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आवर्धन-क्षमता

दूरदर्शी की आवर्धन-क्षमता (कोणीय आवर्धन)

M= (अन्तिम प्रतिबिम्ब द्वारा आँख पर बना दर्शन कोण) /(वस्तु द्वारा आँख पर बना दर्शन कोण जबकि वस्तु अपनी वास्तविक स्थिति में हो )

चूँकि आँख नेत्रिका E के समीप है, अत: अन्तिम प्रतिबिम्ब A”B” द्वारा नेत्रिका पर बने कोण β को ही A”B” द्वारा आँख पर बना कोण मान सकते B हैं। इसी प्रकार चूँकि वस्तु AB, दूरदर्शी से बहुत दूर है, अत: वस्तु द्वारा अभिदृश्यक 0 पर बने कोण α को वस्तु द्वारा आँख पर बना कोण मान सकते हैं। तब

                   M =β/α

कोण β व α बहुत छोटे होते हैं, अतः इनके स्थान पर इनकी स्पर्शज्या (tan) लिख सकते हैं। तब

    β = tanβ=A'B'/EA'                   (चित्र से) 

   α = tanα=A'B'/ΟA'     

Μ= (A’B’/EA’) / (A’B’/ΟA’) =OA’ /EA’

यदि अभिदृश्यक लेन्स 0 की फोकस-दूरी F₀ हो तथा A’B’ की नेत्रिका E से दूरी uₑ हो, तो उचित चिह्न लेने पर OA’ = +fₒ तथा EA’ = -uₑ;
अत: उपरोक्त समीकरण से

            M = - f₀/uₑ

यह आवर्धन-क्षमता का व्यापक सूत्र है।
इसकी निम्न दो स्थितियाँ सम्भव हैं

जब अन्तिम प्रतिबिम्ब स्पष्ट दृष्टि की न्यूनतम दूरी D पर बनता है

यदि अन्तिम प्रतिबिम्ब A”B” की नेत्रिका से दूरी D है, तब लेन्स सूत्र 1/υ – 1/u =1/ f में नेत्रिका के लिए v = -D,u = -uₑ तथा f = +fₑ (जहाँ fₑ नेत्रिका की फोकस-दूरी है) रखने पर

(1/-D) - (1/-uₑ)= 1/fₑ

अथवा 1/uₑ = 1/fₑ+1/D =1/fₑ{1+(fₑ/D)}
1/uₑ का यह मान समी0 (1) में रखने पर,
M =-f₀/fₑ{1+(fₑ/D)} …………(2)

इस सूत्र में f₀,fₑ तथा D के केवल आंकिक मान रखेंगे।
इस स्थिति में दूरदर्शी की लम्बाई f₀ +uₑ होगी।

जब अन्तिम प्रतिबिम्ब अनन्तता पर बनता है

श्रांत आँख (relaxedeye) से देखने के लिए अन्तिम प्रतिबिम्ब अनन्तता पर बनना चाहिए चित्र (b)। इसके लिए नेत्रिका तथा अभिदृश्यक के बीच दूरी इतनी रखते हैं कि वस्तु AB का अभिदृश्यक 0 द्वारा बना प्रतिबिम्ब A’B’ , नेत्रिका के फोकस Fₑ’ पर पड़े (uₑ = fₑ) । दूरदर्शी का यह समायोजन सामान्य समायोजन कहलाता है।

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समी0 (1) में uₑ= fₑ रखने पर

M =-f₀/fₑ ................(3)

इस स्थिति में दूरदर्शी की लम्बाई f₀ +fₑ होगी। सूत्र (2) तथा (3) से स्पष्ट है कि दूरदर्शी की आवर्धन-क्षमता बढ़ाने के लिए अभिदृश्यक लेन्स की फोकस-दूरी f₀ बड़ी तथा नेत्रिका की फोकस दूरी fₑ छोटी होनी चाहिए। ऋणात्मक चिह्न इस बात का सूचक है कि अन्तिम प्रतिबिम्ब उल्टा बनता है।

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