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बन्धन ऊर्जा वक्र बनाइए | तथा इसके आधार पर निम्नलिखित को स्पष्ट कीजिए

प्रश्न 2- विभिन्न नाभिकों की बन्धन ऊर्जा प्रति न्यूक्लिऑन संख्या (A) के साथ परिवर्तन, ग्राफ द्वारा निरूपित कीजिए। कारण बताते हुए समझाइए कि क्यों हल्के नाभिकों का सामान्यतः नाभिकीय संलयन होता है? (2014)
या
बन्धन ऊर्जा वक्र बनाइए तथा इसके आधार पर निम्नलिखित को स्पष्ट कीजिए:
(i) नाभिकीय विखण्डन,
(ii) नाभिकीय संलयन (2019, 20)

बन्धन ऊर्जा वक्र बनाइए

उत्तर- विभिन्न परमाणुओं के नाभिकों के स्थायित्व की तुलना करने के लिये नाभिकों की ‘प्रति न्यूक्लिऑन बन्धन-ऊर्जा’ (binding energy per nucleon) ज्ञात करते हैं। किसी नाभिक की प्रति न्यूक्लिऑन बन्धन-ऊर्जा जितनी अधिक होती है। नाभिक उतना ही अधिक स्थायी होता है। विभिन्न परमाणुओं के नाभिकों के स्थायित्व का अध्ययन करने के लिये इनकी प्रति न्यूक्लिऑन बन्धन-ऊर्जा तथा द्रव्यमान-संख्या के बीच ग्राफ खींचा जाता है। प्राप्त वक्र को बन्धन-ऊर्जा वक्र कहते हैं।
इस वक्र से निम्न महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष प्राप्त होते हैं

(i). द्रव्यमान-संख्या लगभग A = 50 से A = 80 तक के बीच वक्र में एक सपाट शिखर (flat maximum) है जिसके संगत औसत प्रति न्यूक्लिऑन बन्धन-ऊर्जा लगभग 8.5 Mev है। अत: वे नाभिक जिनकी द्रव्यमान संख्याएँ 50 व 80 के बीच हैं, अधिक स्थायी हैं। इनमें Fe56, जिसकी प्रति न्यूक्लिऑन बन्धन-ऊर्जा अधिकतम (लगभग 8.8 MeV) हैं, सबसे अधिक स्थायी हैं।

(ii) 80 से ऊँची द्रव्यमान-संख्या वाले नाभिकों के लिए प्रति न्यूक्लिऑन बन्धन-ऊर्जा धीरे-धीरे घटती जाती है तथा यूरेनियम नाभिक (A = 238) के लिए लगभग 7.6 Mev रह जाती है। अत: नाभिकों का स्थायित्व भी घटता जाता है। यही कारण है कि 83Bi²⁰⁹ के आगे वाले भारी नाभिक रेडियोऐक्टिव हैं।

(iii) 50 से नीची द्रव्यमान-संख्या वाले नाभिकों के लिए भी प्रति न्यूक्लिऑन बन्धन-ऊर्जा घटने लगती है, तथा 20 से नीचे बहुत तेजी से घट जाती है। उदाहरण के लिए, भारी हाइड्रोजन (A = 2) के लिए यह केवल 1.1 Mev होती है। इससे यह पता चलता है कि 20 से नीचे द्रव्यमान संख्या वाले नाभिक अपेक्षाकृत कम स्थायी हैं।

(iv) A = 50 से नीचे, वक्र सतत रूप से नहीं गिरता, बल्कि ₈O¹⁶, ₆C¹² तथा 2He⁴ नाभिकों पर गौण शिखर प्राप्त होते हैं। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि ये (सम-सम) नाभिक समीप की द्रव्यमान-संख्याओं वाले अन्य नाभिकों से अधिक स्थायी हैं।

(v) यह वक्र मोटे तौर पर बताता है कि बहुत भारी तथा बहुत हल्के नाभिकों की प्रति न्यूक्लिऑन बन्धन-ऊर्जा बाद वाले नाभिकों के सापेक्ष कम होती है। अतः यदि हम किसी बहुत भारी नाभिक (जैसे यूरेनियम) को किसी विधि द्वारा अपेक्षाकृत हल्के (अर्थात् बीच वाले) नाभिकों में तोड़ लें तो प्रति न्यूक्लिऑन बन्धन-ऊर्जा बढ़ जायेगी। अतः इस प्रक्रिया में ऊर्जा बहुत बड़ी मात्रा में मुक्त होगी। इस प्रक्रिया को ‘नाभिकीय विखण्डन’ (nuclear fission) कहते हैं।

इसी प्रकार, यदि हम दो अथवा अधिक बहुत हल्के नाभिकों (जैसे—भारी हाइड्रोजन ₁H² के नाभिक) को किसी विधि द्वारा अपेक्षाकृत भारी नाभिक (जैसे-₂He⁴) में संयुक्त कर लें तब भी प्राप्त न्यूक्लिऑन बन्धन-ऊर्जा बढ़ जायेगी। इस प्रक्रिया में भी अत्यधिक ऊर्जा मुक्त होगी। इस प्रक्रिया को ‘नाभिकीय संलयन’ (nuclear fusion) कहते हैं।

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प्रश्न 1- समस्थानिक तथा समभारिक का अर्थ दो-दो उदाहरण देकर समझाइए। (2012, 14, 17, 19, 20)

प्रश्न 2-हाइड्रोजन परमाणु के लिए ऊर्जा-स्तर आरेख खींचिए तथा स्पेक्ट्रमी रेखाओं की लाइमन, बॉमर तथा पाश्चन श्रेणियों की उत्पत्ति समझाइए। इन श्रेणियों में से कौन-सी स्पेक्ट्रम के दृश्य भाग में के मिलती है? (2015, 17, 18)

प्रश्न 3- हाइड्रोजन स्पेक्ट्रम की विभिन्न श्रेणियों के लिए तरंगदैर्घ्य का सूत्र लिखिए। हाइड्रोजन परमाणु की लाइमन श्रेणी की प्रथम रेखा की तरंगदैर्घ्य ज्ञात कीजिए। इस श्रेणी की सीमा तरंगदैर्घ्य भी ज्ञात कीजिए| R=1.097×10⁷ मी⁻¹ (2012, 18)

प्रश्न 4- हाइड्रोजन परमाणु की nवीं कक्षा में इलेक्ट्रॉन की ऊर्जा Eₙ= -13.6/n² इलेक्ट्रॉन वोल्ट (eV) सूत्र से दी जाती है। इसके आधार पर
(i) n=1,2,3,4,5,6 तथा ० के लिए विभिन्न ऊर्जा स्तरों की खींचिए।
(ii) विभिन्न इलेक्ट्रॉनिक संक्रमणों द्वारा हाइड्रोजन परमाणु के उत्सर्जन स्पेक्ट्रम की लाइमन तथा बॉमर श्रेणियों को प्रदर्शित कीजिए।(2015, 17)

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