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साइक्लोट्रॉन के सिद्धान्त एवं कार्य विधि

प्रश्न – साइक्लोट्रॉन के सिद्धान्त एवं कार्य विधि का संक्षिप्त विवरण दीजिए। साइक्लोट्रॉन की सीमाओं का उल्लेख कीजिए। (2017) 

साइक्लोट्रॉन के सिद्धान्त

चुम्बकीय क्षेत्र में परिक्रमण करने वाले आवेशित कणों की परिक्रमण आवृत्ति कण की ऊर्जा पर निर्भर नहीं करती है। अत: क्रॉसित (परस्पर लम्बवत्) वैद्युत तथा चुम्बकीय क्षेत्रों का उपयोग कर आवेशित कण को चुम्बकीय क्षेत्र की सहायता से बार-बार एक ही वैद्युत क्षेत्र से गुजारकर उसको उच्च ऊर्जा  तक त्वरित किया जा सकता है।  

साइक्लोट्रॉन के सिद्धान्त एवं कार्य विधि

साइक्लोट्रॉन के कार्य विधि

माना mद्रव्यमान तथा +q आवेश का एक आयन, आयन-स्रोत से उस क्षण निर्गत होता है जबकि D₂ ऋण विभव पर है। यह आयनन डीज के बीच के अन्तराल में विद्यमान वैद्युत क्षेत्र के द्वारा D₂ की ओर को त्वरित होकर D₂, में वेग v (माना) से प्रवेश कर जाता है। डीज के भीतर प्रवेश करते ही यह आयन डीज की धात्विक दीवारों द्वारा वैद्युत क्षेत्र से परिरक्षित कर दिया जाता है।

अब डीज के तल के लम्बवत् चुम्बकीय क्षेत्र के कारण आयन नियत चाल ” से त्रिज्या । के वृत्ताकार पथ पर चलने लगता है। आयन की वृत्तीय गति के लिए आवश्यक अभिकेन्द्र बल, उस पर कार्यरत चुम्बकीय बल से प्राप्त होता है।

अतः   अभिकेन्द्र बल = चुम्बकीय बल

mv²/r= qvB

अथवा     r =mv/qB    [जहाँ B चुम्बकीय क्षेत्र है] 

 आयन द्वारा एक अर्द्ध-वृत्त पूरा करने में लिया जाने वाला समय

t=πr/v=πm/dB… (i)

किरचॉफ के नियम (Kirchhoff’s Laws)

 समीकरण (i) से स्पष्ट है कि आयन द्वारा किसी एक D से होकर जाने में लिया गया समय, आयन की चाल तथा वृत्त की त्रिज्या पर निर्भर नहीं है, यह केवल चुम्बकीय क्षेत्रB तथा आयन के आवेश-द्रव्यमान अनुपात q/mपर निर्भर करता है।

 आयन का आवर्तकाल, T= 2t =2πm/Bp

अनुनाद उत्पन्न करने के लिए प्रत्यावर्ती विभव की आवृत्ति,

v₀=1/T=Bp/2πm

 इस आवृत्ति को साइक्लोट्रॉन आवृत्ति (cyclotron frequency) कहते हैं।

साइक्लोट्रॉन की सीमाएँ

(i) साइक्लोट्रॉन द्वारा अनावेशित कण जैसे-न्यूट्रॉन (जो कि नाभिकीय क्रियाओं के लिए सर्वश्रेष्ठ प्रक्षेप्य कण है) को त्वरित नहीं किया जा सकता है।

(ii) साइक्लोट्रॉन द्वारा इलेक्ट्रॉनों को त्वरित नहीं किया जा सकता है क्योंकि इनका द्रव्यमान बहुत कम होता है, अत: सूक्ष्म गतिज ऊर्जा ग्रहण कर ही ये बहुत उच्च वेग से गति करने लगते हैं। 

(iii) साइक्लोट्रॉन द्वारा आवेशित कणों को इतने उच्च वेग तक त्वरित नहीं किया जा सकता है कि उनका वेग प्रकाश के वेग के तुल्य हो जाए क्योंकि इतने उच्च वेग पर आवेशित कणों का द्रव्यमान नियत न रहकर वेग के साथ परिवर्तित होता हैं। यदि आवेशित कण का विराम द्रव्यमान m₀ हो तथा v वेग से गति करते समय कण का वेग m हो, तब 

m=m₀/√(1-(v²/c²)

 जहाँ, c निर्वात् में प्रकाश की चाल है। 

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