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सौर सेल क्या है परिभाषा | सौर सेल की कार्य प्रणाली -उपयोग

प्रश्न – सौर सेल की कार्य प्रणाली समझाइए तथा उसके उपयोग लिखिए। (2019, 20)

सौर सेल क्या है परिभाषा

सौर सेल यह एक एसी युक्ति है जो प्रकाश उर्जा को विधुत उर्जा में परिवर्तित कर डेटा है यह प्रकाश वोल्टीय प्रभाव के सिद्धांत पर आधारित एक अर्धचालक युक्ति है जिसकी सहायता से प्रकाश को विधुत धारा में परिवर्तन कर देता है

सौर सेल क्या है परिभाषा

सौर सेल की कार्य प्रणाली

सौर सेल p-n सन्धि वाली एक ऐसी युक्ति होती है जो सौर-विकिरणों के आपतित होने पर emf उत्पन्न करती है। यह फोटोडायोड के सिद्धांत (फोटोवोल्टीय प्रभाव) पर कार्य करता है। अंतर केवल इतना है कि इसमें कोई बाह्य बायस प्रयुक्त नहीं की जाती तथा अधिक ऊर्जा प्राप्त करने के लिए संधि का क्षेत्रफल अधिक रखा जाता है जिससे अधिक मात्रा में सौर विकिरण सन्धि पर आपतित हो। यह अधिकतर सिलिकॉन का बना होता है। चित्र (a) में एक सरल p-n सन्धि सौर सेल दर्शाया गया है इसमें लगभग 300 μm मोटी p-Si पटलिका के, एक फलक पर n-Si की एक पतली (~0.3 μm) परत ग्राही पंच संयोजक अपद्रव्य के विसरण प्रक्रिया या वाष्प के द्वारा बनायी जाती है।

जिसमें से प्रकाश बिना किसी ऊर्जा हानि के पार हो जाता है तथा इस पर एक एण्टी परावर्तक परत (antireflection coating) लगी होती है। p-si के दूसरे फलक पर किसी धातु का लेपन (पश्च स्पर्श) किया जाता है। n-Si सतह के शीर्ष पर धातु फिंगर इलेक्ट्रोड [metallised finger electrode अथवा धात्विक ग्रिड (कंधा नुमा)] निक्षेपित करते हैं। यह अग्र संपर्क की भाँति कार्य करता है। धात्विक ग्रिड सेल के क्षेत्रफल का बहुत थोड़ा भाग (< 15%) घेरती है ताकि सेल पर अधिक प्रकाश, शीर्ष से आपति हो सके चित्र (b)। इसका प्रतीक चित्र (c) में दर्शाया गया है।

प्रकाश पड़ने पर सौर सेल द्वारा emf उत्पन्न होना निम्नलिखित तीन मूल प्रक्रियाओं के कारण है, ये तीन प्रक्रियाएँ हैं-जनन, पृथक्कन तथा संग्रह-

(i) संधि के निकट प्रकाश (hv>Eg के साथ) के कारण इलेक्ट्रॉन होल (e-h) युगलों का जनन;

(ii) अवक्षय परत पर वैद्युत क्षेत्र के कारण इलेक्ट्रॉनों व होलों का पृथक्कन। प्रकाश जनित इलेक्ट्रॉन n-फलक की ओर तथा होल p-फलक की ओर चलते हैं;

(iii) n-फलक पर पहुँचने वाले इलेक्ट्रॉन अग्र संपर्क द्वारा संग्रह किए जाते हैं तथा p-फलक पर पहुँचने वाले होल पश्च सम्पर्क द्वारा संग्रह किए जाते हैं। इस प्रकार p-फलक धनात्मक तथा n-फलक ऋणात्मक हो जाता है, जिसके फलस्वरूप फोटोवोल्टता प्राप्त (उत्पन्न) होती है।

जब चित्र (d) में दर्शाए अनुसार कोई बाह्य लोड RL संयोजित किया जाता है तो लोड से एक प्रकाश धारा iL प्रवाहित होती है। चित्र (e) में किसी सौर सेल का प्रतिरूपी i-V अभिक्षणिक वक्र दर्शाया गया है।

यह तथ्य महत्त्वपूर्ण है कि सौर सेल के i-V अभिलक्षणिक को निर्देशांक अक्षों के चौथे चतुर्थांश में खींचा गया है। इसका कारण यह है कि सौर सेल कोई विद्युत धारा नहीं लेता बल्कि यह लोड को विद्युत धारा की आपूर्ति करता है।
सौर सेलों के निर्माण के लिए आदर्श पदार्थ के रूप में उन अर्द्धचालकों को लेते हैं, जिनका बैण्ड अंतराल 1.5 ev के निकट होता है,

जैसे(Eg = 1.1eV),GaAs (E, = 1.43ev), CdTe (Eg = 1.45ev). CulnSe₂ ( (Ea = 1.04ev) आदि हैं। सौर सैलों के निर्माण के लिए पदार्थों के चयन के लिए मुख्य कसौटियाँ हैं:
(i) बैण्ड अंतराल (~10 से 1.8 ev),
(ii) अधिक i प्रकाश अवशोषण क्षमता,
(iii ) वैद्युत चालकता,
(iv) कच्चे पदार्थ की उपलब्धता तथा
(v) लागत।

सौर सेल का उपयोग

सौर सेलों को सदैव ही तेज सूर्य के प्रकाश की आवश्यकता नहीं होती। कोई भी प्रकाश जिसकी, ऊर्जा बैण्ड अंतराल से अधिक हो, उपयोगी हो सकता है। सौर सेलों का उपयोग उपग्रहों में उपयोग होने वाली इलेक्ट्रॉनिक युक्तियाँ उद्भासनमापी (Exposuremeter), अंतरिक्ष यानों तथा कुछ कैलकुलेटरों की वैद्युत आपूर्ति के लिए भी किया जाता है। वृहत पैमाने पर सौर ऊर्जा का उपयोग करने के लिए कम लागत व कम द्रव्यमान के फोटोवोल्टीय सेलों का उत्पादन उपयोगी होता है।

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Q.1 सौर सेल क्या है परिभाषा

Ans- सौर सेल यह एक एसी युक्ति है जो प्रकाश उर्जा को विधुत उर्जा में परिवर्तित कर डेटा है यह प्रकाश वोल्टीय प्रभाव के सिद्धांत पर आधारित एक अर्धचालक युक्ति है जिसकी सहायता से प्रकाश को विधुत धारा में परिवर्तन कर देता है

Q.2 सौर सेल की कार्य प्रणाली

Ans- सौर सेल p-n सन्धि वाली एक ऐसी युक्ति होती है जो सौर-विकिरणों के आपतित होने पर emf उत्पन्न करती है। यह फोटोडायोड के सिद्धांत (फोटोवोल्टीय प्रभाव) पर कार्य करता है। अंतर केवल इतना है कि इसमें कोई बाह्य बायस प्रयुक्त नहीं की जाती तथा अधिक ऊर्जा प्राप्त करने के लिए संधि का क्षेत्रफल अधिक रखा जाता है …..

Q.3 सौर सेल का उपयोग

Ans– सौर सेलों को सदैव ही तेज सूर्य के प्रकाश की आवश्यकता नहीं होती। कोई भी प्रकाश जिसकी, ऊर्जा बैण्ड अंतराल से अधिक हो, उपयोगी हो सकता है।….

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