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Principle of moving Coil Galvanometer class 12

प्रश्न 9- आवश्यक सिद्धान्त देते हुए चल कुण्डली गैल्वेनोमीटर की संरचना तथा कार्यविधि का वर्णन कीजिए। (2014)   या

चल कुण्डली धारामापी का सिद्धान्त एवं कार्यविधि का वर्णन कीजिए। (2017, 18) या निम्नलिखित चल कुण्डली धारामापी का सिद्धान्त लिखिए एवं उसकी धारा सुग्राहिता का व्यंजक ज्ञात कीजिए। (2018)  या सिद्ध कीजिए कि चल कुण्डल धारामापी में प्रवाहित धारा उसमें उत्पन्न विक्षेप के अनुक्रमानुपाती होती है। (2019, 20)    या

चल कुण्डली गैल्वेनोमीटर-ये निम्न दो प्रकार के होते हैं

निलम्बित कुण्डली धारामापी-यह वैद्युत

धारा के संसूचन    (detection ) तथा मापन (measurement) के लिए प्रयुक्त किया जाने वाला उपकरण है। इसकी क्रिया चुम्बकीय क्षेत्र में धारावाही कुण्डली पर कार्यरत् बलाघूर्ण पर आधारित है। इस कुण्डली को एक पतली फॉस्फर-ब्रॉन्ज (phosphor-bronze) की पत्ती scale arrangement) की सहायता से पढ़ा जा सकता है। सम्पूर्ण प्रबन्ध को एक धात्विक बक्से में बन्द रखा जाता है जिसके सामने की ओर काँच की एक खिड़की तथा आधार पर समतलकारी पेंच (levelling screws) लगे होते हैं।

संरचना

इसमें एक आयताकार कुण्डली होती है जोकि ताँबे के पतले पृथक्कृत (insulated) तार के ऐलुमिनियम के फ्रेम के ऊपर लपेटकर बनायी जाती है।इस कुण्डली को एक पतली फॉस्फर-ब्रॉन्ज (phosphor-bronze) की पत्ती (strip) से एक स्थायी घोड़ा-नाल चुम्बक (horse-shoe magnet) NS के बेलनाकार ध्रुव-खण्डों (pole-pieces) के बीच लटकाया जाता है। पत्ती का ऊपरी सिरा एक मरोड़ टोपी (torsion head) से जुड़ा होता है।

कुण्डली का निचला सिरा एक अत्यन्त पतले फॉस्फर-ब्रॉन्ज के तार के ढीले-वेष्ठित स्प्रिंग (loosely-wound spring) से जुड़ा होता है। कुण्डली के भीतर एक नर्म लोहे की क्रोड ( सममित तथा बिना कुण्डली को स्पर्श किए रखी जाती है। क्रोड बल-रेखाओं को संकेन्द्रित कर देती है तथा इस प्रकार ध्रुव-खण्डों के बीच चुम्बकीय क्षेत्र ‘प्रबल’ हो जाता है। निलम्बन पत्ती (suspension strip) के निचले भाग पर एक छोटा दर्पण (mirror) M लगा होता है, जो पत्ती के साथ-साथ घूमता है तथा जिसका विक्षेप एक लैम्प तथा पैमाने( lamp and scale arrangement) की सहायता से पढ़ा जा सकता है।

सम्पूर्ण प्रबन्ध को एक धात्विक बक्से में बन्द रखा जाता है जिसके सामने की ओर काँच की एक खिड़की तथा आधार पर समतलकारी पेंच (levelling screws) लगे होते हैं।

Principle of moving Coil Galvanometer class 12

– धारा जिसका मापन करना हो, एक टर्मिनल (terminal) T₁से प्रवेश करती है तथा निलम्बन, कुण्डली व स्प्रिंग से होकर दूसरे टर्मिनलाT₂ से निर्गत होती है। स्थायी चुम्बक के ध्रुव खण्ड बेलनाकार रखे जाते हैं ताकि कुण्डली की प्रत्येक स्थिति में चुम्बकीय क्षेत्र त्रिज्य (radial) रहे अर्थात् कुण्डली का तल प्रत्येक स्थिति में बल-रेखाओं के समान्तर रहे।

 सिद्धान्त

जब कुण्डली में धारा । प्रवाहित की जाती है तो कुण्डली पर लगने वाला बल-आघूर्ण τ = Ni ABsin90° = NiBA

यहाँ θ कुण्डली के तल पर लम्ब की दिशा तथा चुम्बकीय क्षेत्र B̅ की दिशा के बीच कोण है। A कुण्डली का क्षेत्रफल तथा N कुण्डली में फेरों की संख्या है।

धारामापी में चुम्बकीय क्षेत्र B̅ को, ध्रुवखण्डों N व S को बेलनाकार बनाकर तथा कुण्डली के भीतर नर्म लोहे की बेलनाकार क्रोड रखकर “त्रिज्य” (radial) बनाया जाता है। इस दिशा में कुण्डली के तल पर अभिलम्ब चुम्बकीय क्षेत्र B̅ से सदैव समकोण पर होगा अर्थात् θ= 90° होगा। अतः कुण्डली पर कार्यरत् बलाघूर्ण

 τ = Ni B Asino = 90° = Ni BA

 यदि निलम्बन पत्ती की मरोड़ दृढ़ता (torsionalrigidity) c हो तथा निलम्बन पत्ती में ऐंठन हो, तो प्रत्यानयन बल-युग्म =cΦ होगा। साम्यावस्था के लिये,

विक्षेपक बल-युग्म आघूर्ण = प्रत्यानयन बल-युग्म का आघूर्ण

Ni A B =cΦ

i=CΦ/NAB= kΦ

जहाँ, k = c /NAB उपकरण का नियतांक है। जिसे धारा परिवर्तन गुणांक (current reduction factor) भी कहते हैं। अतः धारामापी में प्रवाहित धारा, उत्पन्न विक्षेप के अनुक्रमानुपाती होती है। 

2. कीलकित-कुण्डली अथवा वेस्टन धारामापी

यह भी चल कुण्डली धारामापी है। यह निलम्बित-कुण्डली धारामापी की अपेक्षा कुछ कम सुग्राही होती है  परन्तु अधिक सुविधाजनक है। इसमें ताँबे के महीन पृथक्कृत तार की, ऐलुमीनियम के फ्रेम पर लिपटी कुण्डली एक स्थायी तथा शक्तिशाली नाल-चुम्बक के ध्रुव-खण्डों के बीच दो चूलों (pivots) पर झूलती है।कुण्डलियों के दोनों सिरों पर चूलों के पास दो स्प्रिंग लगे रहते हैं जो कुण्डली के घूमने पर ऐंठन बल-युग्म उत्पन्न करते हैं तथा कुण्डली को दो सम्बन्धक-पेचों T₁ व T₂से जोड़ते हैं।

Principle of moving Coil Galvanometer class 12

कुण्डली का विक्षेप पढ़ने के लिए कुण्डली के साथ एक ऐलुमीनियम का लम्बा संकेतक लगा रहता है जो एक वृत्ताकार पैमाने पर घूमता है। पैमाने पर बराबर दूरियों पर चिह्न लगे रहते हैं तथा शून्यांक चिह्न बीच में होता है। अतः धारामापी के सम्बन्धक-पेचों पर धन व ऋण के चिह्न नहीं बने होते। चुम्बकीय क्षेत्र को त्रिज्य बनाने के लिए इससे भी ध्रुव-खण्ड अवतलाकार कटे होते हैं तथा कुण्डली के अन्दर मुलायम लोहे की क्रोड लगी होती है।

इसका सिद्धान्त व कार्यविधि चल-कुण्डली धारामापी के समान ही है। इसकी सहायता से 10⁻⁶ ऐम्पियर तक की वैद्युत धारा नापी जा सकती है।

धारामापी की सुग्राहिता N, A तथा B का मान बढ़ाकर तथा c का मान कम करके बढ़ाई जा सकती है।

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Some Important Physics Questions

प्रश्न- हाइगेन्स के द्वितीयक तरंगिकाओं के सिद्धान्त के आधार पर परावर्तन के नियमों की व्याख्या कीजिए। (2012, 14)